कहीं अंदर कुछ तो खाली है।
मुझे मेरा कमरा भरा-भरा भाता ही नहीं है।
फैले हुए कपड़ों को समेट देती हूँ, खाली डिब्बों को बर्तनवाली को दे देती हूँ।
बिस्तर के बगल वाली मेज़ पे कोई सुंदर सा लैम्प या कैंडल रखना भी अच्छा नहीं लगता।
क्योंकि उनकी रोशनी होती है, तो अंदर का वो खाली कमरा दिखाई देता है।
उसमें ना कोई रहता है, ना कोई सामान है, ना कोई याद, ना कोई दुश्मन है, ना ही कोई दोस्त।
तो वो कमरा बेच दूँ? पर किसको?
किरायेदार अच्छे नहीं लगते, आते हैं, कुछ देर में चलते बनते हैं, सब सामान ले जाते हैं,
फिर से कमरा एकदम खाली, और फिर से ताला लगा देती हूँ, छोड़ देती हूँ,
रोज़ के काम में भूल जाती हूँ, और याद आता है, तो परेशान होती हूँ,
क्योंकि याद नहीं, कि उस कमरे की चाबी कहाँ है।